सुबह की ट्रेन में उगते सूरज को देखते हुए—ये पंक्तियाँ अपने आप उतर आईं।
सूर्य
वो चमका ऐसे जैसे कोयले में हीरा
रोशनी ऐसी जो भगाए घोर अँधेरा
वो चमका ऐसे जैसे मिट्टी में सोने का सिक्का
महत्त्व ऐसा जैसे हुक्म का इक्का
वो चमका ऐसे जैसे खुशहाल बच्चे की आँख
तेज़ ऐसा जिसमें बुराई जलकर हो राख
वो चमका ऐसे जैसे हो नाग मणि
सुंदर ऐसा जैसे साड़ी में हो नारी खड़ी
वो चमका ऐसे जैसे सज्जन का मुख
जीवन में होना उसका जैसे परम सुख
PS: Written in Hindi, felt beyond language.



One Comment
Rajkumar Sharma
True